भारत के इस रेलवे स्टेशन पर नहीं है एक भी कर्मचारी, जानें वहां पर कौन काटता है टिकट

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ट्रेनों में यात्रा के दौरान आपकी नजर कई रेलवे स्टेशनों पर पड़ती होगी। स्टेशनों पर कूलियों से लेकर टीसी, रेलवे मास्टर और अन्य कर्मचारियों को काम करते आपने देखा होगा। कुल मिला कर यूं कह लें कि इन कर्मचारियों के बिना तो रेलवे स्टेशन चल ही नहीं सकता, लेकिन हम आपको बता दें कि ऐसा नहीं है।

railway station

भारत में एक ऐसा रेलवे स्टेशन मौजूद है, जहां रेलवे का कोई कर्मचारी काम नहीं करता। इस स्टेशन को भारतीय रेलवे संचालित ही नहीं करता है। है ना चौंकाने वाला, लेकिन ये सच है। राजस्थान में नागौर जिला मुख्यालय से करीब 80 किलोमीटर दूर जालसू नानक हॉल्ट रेलवे स्टेशन देश का खास रेलवे स्टेशन है। यह रेलवे द्वारा नहीं बल्कि क्षेत्र के ग्रामीणों द्वारा चलाया जाता है।

गांव वाले चलाते हैं स्टेशन

ग्रामीण टिकट बेचते हैं, स्टेशन चलाते हैं और इसके रखरखाव का काम भी गांव के ही निवासियों द्वारा किया जाता है। हालांकि, 17 सालों तक ऐसा करने के बाद अब वे स्टेशन का प्रबंधन रेलवे को सौंपना चाहते हैं और इस आशय का ज्ञापन जोधपुर डीआरएम को सौंपा है।

अब रेलवे को सौंपना चाहते हैं प्रबंधन

स्टेशन को सरेंडर करने की इच्छा के दो कारण हैं : पहला, ग्रामीणों द्वारा स्टेशन को चलाने के लिए नियुक्त एकमात्र व्यक्ति को काम का प्रबंधन करना मुश्किल हो रहा है और दूसरा, यह आर्थिक रूप से अव्यवहारिक होता जा रहा है।

ईश्वर सिंह, जो पिछले पांच वर्षों से स्टेशन चला रहे हैं, ने कहा कि टिकट बिक्री से कमीशन बहुत कम था, जिसके कारण उन्हें अपनी जेब से पैसा खर्च करना पड़ा।

गांव के सरपंच कैलाश का कहना है कि “टिकट काउंटर पर बैठने वाले को कमीशन के रूप में 5,000 रुपये से अधिक नहीं मिलता है। इसके अलावा स्थायी कर्मचारियों की कमी के कारण स्टेशन की सुरक्षा भी एक मुद्दा है और यात्री रात में यात्रा नहीं कर सकते हैं”।

जालसू नानक हॉल्ट रेलवे स्टेशन 1976 में सैनिकों और उनके परिवारों की आवाजाही को सुविधाजनक बनाने के लिए शुरू किया गया था। रेलवे स्टेशन के पास तीन गांव जालसू कला, जालसू खुर्द और जालसू नानक हैं।

सुरक्षा बलों में कई सदस्य

वर्तमान में 200 से अधिक ग्रामीण सेना, बीएसएफ, नौसेना, वायु सेना और सीआरपीएफ में हैं। इनमें 250 से अधिक सेवानिवृत्त सैनिक भी हैं, लेकिन चूंकि स्टेशन से राजस्व में गिरावट आई, इसलिए 2005 में स्टेशन को बंद करने का निर्णय लिया गया।

इससे ग्रामीणों ने विरोध करना शुरू कर दिया। ग्रामीणों द्वारा दी गयी जानकारी के अनुसार रेलवे ने उनके सामने एक अजीब शर्त रखी थी। रेलवे ने कहा कि ग्रामीण रेलवे स्टेशन चला सकते हैं, लेकिन उन्हें महीने में कम से कम 1,500 टिकट बेचने होंगे। इसे स्वीकार कर लिया गया और तब से यह स्टेशन ग्रामीणों द्वारा चलाया जा रहा है।

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