नाटी इमली का भरत मिलाप: काशी ने निभाई अपनी परंपरा के 480 वर्ष, जानिए इसका पूरा इतिहास

अपनी संस्कृति व परंपरा का निर्वहन करने में सबसे समृद्धतम शहर है बनारस। सात वार के 9 त्यौहार का शहर है बनारस। काशी वासियों का अपना अलग शौक है…. ऐसा शौक जहां आधुनिकता कब्जा नहीं कर पाती और ढकोसलों का प्रवेश निषेध रहता है। काशी में हर त्यौहार अपनी परंपरा की संपूर्ण सज धज के साथ प्रतिनिधित्व करता है ना कि मात्र प्रतीकात्मक औपचारिकता की अभिव्यक्ति।

Bharat Milap

आज के आलेख में हम आपको काशी के विश्व विख्यात “भारत मिलाप” की जानकारी देने जा रहे हैं जिसे यहां की लोक भाषा में “लक्खा मेला” भी कहा जाता है। आगे हमने इस लेख में भारत मिलाप के बारे में कई महत्वपूर्ण जानकारी दी है जिसके बारे में हर किसी को मालूम होना चाहिए।

रघुकुल और यदुकुल के साक्षी बनते हैं यादव बंधु

वाराणसी के नाटी इमली मैदान पर बने चबूतरे पर भरत मिलाप की कहानी हर वर्ष दोहराई जाती है। पूरे नगर से एकत्र यादव बंधु लगभग 5 टन से भी अधिक भार वाले पुष्पक विमान को अपने कंधे व माथे पर रखकर भगवान राम, सीता लक्ष्मण व हनुमान जी सहित नाटी इमली के ऐतिहासिक मैदान पर पहुंचते हैं जहां पहले से ही श्री भरत, शत्रुघ्न प्रभु श्री राम के लिए प्रतीक्षारत रहते हैं। यादव बंधु झक सफेद धोती, बनियान व लाल पगड़ी में क्रमबद्ध तरीके से बारी-बारी से विमान अपने कंधे पर रखकर नाटी इमली मैदान पहुंचते हैं। श्रद्धा और आस्था के इस परम मिलन के साक्षी भगवान भास्कर भी होते हैं। सूर्यास्त से कुछ समय पहले का दृश्य ऐसा होता है मानो भगवान दिवाकर कुछ समय के लिए अपना रथ रोककर इस परम मिलन को अपलक निहारते हैं।

इसका पूरा इतिहास

चित्रकूट रामलीला समिति के व्यवस्थापक पंडित मुकुंद उपाध्याय के अनुसार आज से 479 वर्ष पहले मेघा भगत नामक भगवान राम के अतिशय भक्त को प्रभु श्री राम के स्वप्न में दर्शन हुए। इस स्वप्न दर्शन के बाद से ही रामलीला और भारत मिलाप के मंचन का आयोजन शुरू हुआ जो आज भी अनवरत जारी है। इस कार्य में यादव बंधुओं की एक गौरवान्वित परंपरा का इतिहास रहा है।

गोस्वामी जी ने गंगा के किनारे श्री रामचरितमानस तो लिख दी लेकिन उस समय राम कथा को जन-जन तक पहुंचाने का काम गोस्वामी जी के गुरु भाई मेघा भगत ने किया। यादव कुल के श्री मेघा भगत विश्वेश्वरगंज के फुटे हनुमान जी के मंदिर के पास ही रहते थे और उन्हीं की अथक श्रद्धा के परिणाम स्वरुप ही काशी में रामलीला का मंचन प्रारंभ हुआ। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि लाट भैरव व चित्रकूट की रामलीला गोस्वामी तुलसीदास के समय की ही देन है।

काशी का राज परिवार अपनी पांच पीढ़ियों से रहा है भारत मिलाप का साक्षी

लगभग 227 वर्षों से काशी नरेश का परिवार अपने पारंपरिक शाही सज धज के साथ भारत मिलाप में सहभागिता की परंपरा निभाता आ रहा है। 1796 में पूर्व काशी नरेश महाराजा उदित नारायण सिंह ने सर्वप्रथम भारत मिलाप में सम्मिलित होकर इस शाही परंपरा की शुरुआत की थी।

आस्था और श्रद्धा का अद्भुत जन सैलाब

महज कुछ मिनटों का ऐतिहासिक मंचन देखने के लिए नाटी इमली मैदान का हर कोना, घरों की छत और बारजों पर लोगों का अपार जन समूह अपलक इस भावप्रवण दृश्य को निहारते हुए प्रतीक्षारत दिखता है। गोस्वामी तुलसीदास की चौपाइयों के बीच….

कहत सपेम नाई महि माथा।भरत प्रनाम करत रघुनाथा।।
उठे राम सुनि पेम अधीरा।कहुं पट कहुं निषंग धनु तीरा।।

जब चारों भाइयों के मिलन का मंचन होता है तो वहां खड़े जनमानस के नयन उस भाव की सहज अनुभूति से सजल हो उठते हैं। कहना ना होगा कि काशी हमेशा से अपनी परंपराओं के अतीत, वर्तमान और भविष्य को जीवंत बनाने के लिए कृत संकल्प दिखता है।




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