पाकिस्तान के बाद इस मुस्लिम देश में आई आर्थिक संकट, नहीं मिला रहा लोगों को खाना, अब जनता मस्जिद को लेकर उठा रहे सवाल

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लगभग एक दशक से, मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फ़तह अल-सिसी ने अपनी प्रजा से वादा किया है कि वह अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करेंगे और एक नया राज्य बनाएंगे, लेकिन लाखों लोग अब भी दो वक्त के खाने के लिये तरस रहे हैं। मिस्र का पौंड रिकॉर्ड स्तर पर गिर गया है और मुद्रास्फीति 20 प्रतिशत से ऊपर बढ़ गई है।

Egypt

निजी क्षेत्र लगभग साल भर से विदेशी मुद्रा की कमी से जूझ रहा है, जिससे व्यवसायों पर प्रभाव पड़ा है। दुनिया के अधिकांश देशों की तरह, अरब देश भी कोविड से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं और यूक्रेन और रूस के युद्ध के कारण विपरीत परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं।

नहीं मिल रहा लोगों को खाना, लगातार बन रहे मस्जिद

देश में खाद्य पदार्थों की कीमद इतनी ज्यादा बढ़ गयी है कि लोग सिर्फ तीन कट्टा चावल, दो बोतल दूध और एक बोतल तेल ही खरीद सकते हैं। जहां देश के लोगों को शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य मूलभूत जरूरतें चाहिये, वहीं, इसके विपरीत मिस्र के धार्मिक मंत्रालय ने राष्ट्रपति अब्दुल फतेह अल सिसी के कार्यकाल में हजारों मस्जिदों का निर्माण करवाया है, जिसे लेकर अब जनता इस पर सवाल खड़े कर रही है।

जनता कर रही सवाल

लोग सवाल उठा रहे हैं कि देश में खाने के लाले पड़ने के बावजूद सरकार धार्मिक केंद्रों पर इतना रूपया क्यों खर्च कर रही है। यहां तक कि मस्जिदों के निर्माण के लिये दान पेटी लगायी गयी है। और तो और पिछले साल धार्मिक बंदोबस्ती मंत्रालय ने दान पेटियों के माध्यम से डोनेशन को रद्द कर दिया था और ये तय किया गया कि दान पेटी की बजाय अब मस्जिदों के खातों में दान दिया जायेगा।

140,000 से ज्यादा मस्जिद

मिस्र के धार्मिक मामलों के मंत्री मोहम्मद मुख्तार गोमा ने साल 2020 में एक इंटरव्यू में खुद खुलासा किया था कि उनके देश में 140,000 से ज्यादा मस्जिद मौजूद हैं। उन्होंने भी बताया था कि 2013 में अब्दुल फतेह अल सिसी के राष्ट्रपति बनने के बाद से मस्जिदों के निर्माण या रिनोवेशन पर 10.2 बिलियन मिस्र पाउंड (लगभग 404 मिलियन डॉलर) रूपये खर्च किये गये हैं। जो गरीब दो वक्त की रोटी के लिये तरस रहे हैं, उन्हीं के देश में ये स्थिति उन्हें चिंता में डाल रही है।

लोगों का कहना है कि ऊपरवाले की इबादत तो कहीं से भी की जा सकती है, लेकिन बच्चों की पढ़ाई के लिये स्कूल और पीड़ितों के इलाज के लिये अस्पतालों की जरूरत इससे कहीं ज्यादा है।

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